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एक महिला को जैसे ही अपने गर्भवती होने की सूचना मिलती है, उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहता। हालांकि, गर्भधारण करने की सूचना अपने साथ कई तरह के शारीरिक बदलावों और समस्याओं का अंदेशा लेकर भी आती है। अगर प्रेग्नेंसी के पहले महीने से ही सभी ज़रूरी तैयारियां शुरू कर दी जाएं, तो गर्भावस्था से जुड़ी तमाम परेशानियों को काफ़ी हद तक कम किया जा सकता है।
दरअसल, प्रेग्नेंसी के पहले महीने में खासतौर पर पहली बार मां बनने वाली महिलाओं के पास जानकारी का अभाव होता है। कई बार तो उन्हें अपने प्रेग्नेंट होने तक की सही जानकारी नहीं होती है। इसलिए, मॉमजंक्शन के इस लेख़ में हम आपको प्रेग्नेंसी के पहले महीने (एक से चार सप्ताह) से संबंधित जानकारियों के बारे में विस्तार से बताने जा रहे हैं।

गर्भ ठहरने के 16 शुरुआती लक्षण | Pregnancy Ke Lakshan

प्रेग्नेंसी के पहले महीने में गर्भवती महिला के शरीर में कई तरह के बदलाव होने लगते हैं। इन बदलावों के बारे में सही जानकारी ना होने की वजह से कई बार गर्भवती महिलाएं घबराहट या तनाव का शिकार हो जाती हैं। हालांकि, अगर गर्भवती महिलाओं को प्रेग्नेंसी के पहले महीने में नीचे दिए गए लक्षण नज़र आएं, तो उन्हें बिल्कुल भी घबराना नहीं चाहिए:

1. मासिक धर्म का रुक जाना:

इसे प्रेग्नेंसी की शुरुआत होने का संकेत माना जाता है। दरअसल, किसी महिला के गर्भवती होते ही उसके शरीर में प्रोजेस्टेरोन हार्मोन बनना शुरू हो जाता है। इस हार्मोन की वजह से मासिक धर्म बंद हो जाता है।

2. रक्तस्राव और ऐंठन:

जब गर्भाशय में अंडा निषेचित होता है, तब गर्भ धारण करने वाली महिला को हल्का रक्तस्राव हो सकता है और शरीर में ऐंठन महसूस हो सकती है। गर्भधारण करने के एक सप्ताह बाद गर्भवती महिला के शरीर में ये दोनों लक्षण दिखाई दे सकते हैं।

3. मूड स्विंग:

प्रेग्नेंसी के पहले महीने में गर्भवती महिला के व्यवहार में काफ़ी उतार-चढ़ाव नज़र आने लगता है। यह उतार-चढ़ाव गर्भवती महिला के शरीर में होने वाले हार्मोनल बदलावों की वजह से होता है। इस दौरान गर्भवती महिला का मूड लगातार बदलता रहता है, जैसे कि वह किसी भी बात पर चिढ़ सकती है या उसे बेवजह रोना आ सकता है। 

4. स्तनों का कड़ा होना:

प्रेग्नेंसी के पहले महीने में गर्भवती महिला के स्तन कड़े हो जाते हैं और उनमें हल्का दर्द भी होता है। इस दौरान गर्भवती महिला के स्तनों में थोड़ी सूजन आ सकती है।

5. निप्पल का रंग बदलना:

इस दौरान आपको निप्पल में भी बदलाव नजर आ सकता है। हार्मोंस में बदलाव होने से मेलानोसाइट्स (एक प्रकार की त्वचा कोशिकाएं) प्रभावित होते हैं। इससे उन मेलेनिन का उत्पादन होता है, जिससे त्वचा का रंग गहरा हो जाता है। यही कारण है कि निप्पल का रंग ज्यादा गहरा नजर आ सकता है।

6. थकान होना:

प्रेग्नेंसी के पहले महीने में बिना कुछ किए ही गर्भवती महिला को थकान महसूस हो सकती है। इस दौरान उसे सोने में भी परेशानी हो सकती है।

7. बार-बार पेशाब लगना:

शरीर में प्रोजेस्टेरोन हार्मोन का स्तर बढ़ने के कारण प्रेग्नेंसी के पहले महीने में गर्भवती महिला को बार-बार पेशाब लगने की समस्या हो सकती है।

8. मॉर्निंग सिकनेस:

गर्भवती महिला को प्रेग्नेंसी के पहले महीने में सुबह-सुबह जी मिचलाने, उल्टी होने और चक्कर आने की समस्या हो सकती है।

9. खाने की रुचि और पसंद में बदलाव:

प्रेग्नेंसी के पहले महीने में गर्भवती महिला की खान-पान से जुड़ी रुचि और पसंद में बदलाव नज़र आ सकता है। वह कोई ऐसी चीज़ खाना शुरू कर सकती है, जो उसे पहले पसंद नहीं थी। इस दौरान गर्भवती महिला को बार-बार भूख लग सकती है।

10. सीने में जलन:

प्रेग्नेंसी के पहले महीने में गर्भवती महिला को सीने में जलन की शिकायत हो सकती है, जो सामान्य-सी बात है, इसलिए ऐसा होने पर घबराना नहीं चाहिए। हालांकि, सीने में ज़्यादा जलन होने पर डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।

11. कब्ज़:

गर्भवती महिला के शरीर में प्रोजेस्टेरोन हार्मोन का स्तर बढ़ने के कारण उसे कब्ज़ की शिकायत हो सकती है। प्रेग्नेंसी के पहले महीने में कब्ज़ का होना सामान्य माना जाता है।

12. सूंघने की क्षमता में वृद्धि:

प्रेग्नेंसी के पहले महीने में शरीर में होने वाले हार्मोनल बदलावों के चलते गर्भवती महिला की सूंघने की क्षमता बढ़ जाती है।

13. ज़्यादा भूख लगना:

प्रेग्नेंसी के पहले महीने में गर्भवती महिला की भूख अचानक बढ़ जाती है। वह ज़्यादा मात्रा में आहार लेने लगती है और उसे बार-बार भूख लगने लगती है।

14. सिर में दर्द होना:

गर्भावस्था के शुरुआती दिनों में शरीर में होने वाले हार्मोनल बदलावों के कारण गर्भवती महिला को सिर दर्द होने की शिकायत हो सकती है।

15. पेट के निचले हिस्से में दर्द होना:

प्रेंग्नेंसी के पहले महीने के दौरान गर्भ में भ्रूण प्रत्यारोपित होता है। इसकी वजह से गर्भवती महिला को पेट के निचले हिस्से में दर्द की शिकायत हो सकती है।

16. पीठ में दर्द होना:

गर्भावस्था के पहले महीने में गर्भवती महिला को पीठ दर्द की समस्या हो सकती है। यह गर्भावस्था का शुरुआती लक्षण है, इसलिए इस दर्द से घबराना नहीं चाहिए।

प्रेग्नेंसी की पुष्टि या प्रेग्नेंसी टेस्ट

अगर किसी महिला को अपने शरीर में ऊपर बताए गए लक्षण नज़र आते हैं, तो उसे जल्द से जल्द प्रेग्नेंसी टेस्ट कर लेना चाहिए। गर्भवती महिलाएं यह टेस्ट खुद कर सकती हैं या फिर डॉक्टर से जांच करवा कर गर्भावस्था की पुष्टि की जा सकती है। नीचे उन तरीकों के बारे में बताया गया है, जिनकी मदद से गर्भवती महिलाएं अपनी गर्भावस्था की जांच या उसकी पुष्टि कर सकती हैं:
  • प्रेग्नेंसी किट से जांच: आजकल बाज़ार में कई तरह की प्रेग्नेंसी किट उपलब्ध हैं, जिनकी मदद से खुद ही गर्भावस्था की जांच की जा सकती है। प्रेगनेंसी टेस्ट किट से गर्भावस्था की जांच करने के लिए, सुबह के पहले पेशाब के नमूने को एक छोटे पात्र में लेकर जांच किट के साथ दिए गए ड्रॉपर से कुछ बूंदें जांच पट्टी पर बने खांचे में डालें। इसके बाद 5 मिनट तक इंतज़ार करें। आपको एक या दो हल्की या गहरी गुलाबी लकीरें दिखाई देंगी। इन रंगीन लकीरों का मतलब समझने के लिए जांच किट के साथ दिए गए निर्देशों को ध्यान से पढ़ें। इन निर्देशों के आधार पर टेस्ट के नतीजे का पता लगाया जा सकता है।
  • यूरिन या ब्लड टेस्ट से पुष्टि: गर्भावस्था की पुष्टि करने के लिए डॉक्टर से यूरिन या ब्लड टेस्ट करवाया जा सकता है। इस टेस्ट के नतीजे प्रेग्नेंसी किट से मिले नतीजों से ज़्यादा सटीक और विश्वसनीय माने जाते हैं।
  • अल्ट्रासाउंड से पुष्टि: अगर ऊपर बताए गए दोनों तरीकों से जांच करने के बाद भी गर्भावस्था को लेकर संशय बरकरार हो, तो अल्ट्रासाउंड तकनीक का सहारा लेना चाहिए। इस तकनीक से प्राप्त होने वाले नतीजे को सबसे सटीक माना जाता है।

प्रेग्नेंसी के पहले महीने में शरीर में होने वाले बदलाव

गर्भावस्था के पहले महीने में गर्भवती महिला के शरीर में नीचे दिए गए बदलाव नज़र आ सकते हैं:
  • गर्भवती महिला को अपना शरीर पहले से ज़्यादा फूला हुआ लग सकता है और उसे अपनी पीठ का हिस्सा थोड़ा तंग महसूस हो सकता है।
  • शरीर में एस्ट्रोजन का स्तर बढ़ने और स्तन ग्रंथियों में वृद्धि होने के कारण गर्भवती महिला के स्तन का आकार बढ़ सकता है। 
  • शरीर में प्रोजेस्टेरोन और एस्ट्रोजन हार्मोन का स्तर बढ़ने के कारण गर्भवती महिला के निप्पल ज़्यादा काले और बड़े हो सकते हैं।
  • अंडोत्सर्जन (ovulation) के एक सप्ताह या दस दिन के बाद तक गर्भवती महिला को स्पॉटिंग हो सकती है। ऐसा गर्भ में भ्रूण के प्रत्यारोपित होने के कारण होता है।
  • गर्भवती महिला की योनि से अधिक स्राव हो सकता है।

प्रेग्नेंसी के पहले महीने में बच्चे का विकास और आकार

प्रेग्नेंसी के पहले महीने से ही गर्भ में शिशु के विकास की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। नीचे इस प्रक्रिया के बारे में विस्तार से बताया गया है:

निषेचन की प्रक्रिया

शुक्राणुओं और अंडाणुओं का मिलन निषेचन कहलाता है। निषेचन की प्रक्रिया संभोग के दो से तीन दिन बाद शुरू हो सकती है। इस प्रक्रिया के शुरुआती चरण में शुक्राणुओं और अंडाणुओं के मिलन से एक युग्म बनता है। इस युग्म को अंग्रेज़ी में ‘ज़ाइगोट’ कहते हैं।

प्रत्यारोपण की प्रक्रिया

निषेचन के बाद प्रत्यारोपण की प्रक्रिया शुरू होती है। इस प्रक्रिया में ज़ाइगोट फ़ैलोपियन ट्यूब से होकर गर्भाशय में पहुंचता है। चौथे से छठे दिन के बीच यह ज़ाइगोट कई कोशिकाओं में विभाजित हो जाता है। इसके बाद ये कोशिकाएं इकट्ठा होकर गेंद जैसा आकार ले लेती हैं। इसे ‘ब्लास्टोसिस्ट’ कहते हैं। अगर यह ‘ब्लास्टोसिस्ट’ दो से तीन दिन में गर्भाशय की दीवार से चिपक जाए, तो प्रत्यारोपण की प्रक्रिया सफलता के साथ पूरी हो जाती है।

भ्रूण का विकास

निषेचित अंडे विकसित होने पर एमनियॉटिक सैक का निर्माण होता है। इस दौरान प्लेसेंटा भी विकसित होने लगती है। बात की जाए शिशु के विकास की, तो इस दौरान चेहरा बनना शुरू होगा। आंखों की जगह काले घेरे नज़र आएंगे। इस दौरान शिशु का निचला जबड़ा और गला बनना शुरू होगा। वहीं, रक्त कोशिकाएं बनकर रक्त संचार शुरू होगा। चौथे सप्ताह के अंत तक शिशु का दिल एक मिनट में 65 बार धड़कने लगेगा। इस महीने के अंत तक शिशु ¼ इंच का हो जाएगा, जो चावल के दाने से भी छोटा होगा। 

प्रेग्नेंसी के पहले महीने के लिए आहार

प्रेग्नेंसी की शुरुआत होने पर गर्भवती महिला को ज़्यादा मात्रा में पोषक तत्वों की ज़रूरत पड़ती है। इस बढ़ती ज़रूरत को पूरा करने के लिए, उन्हें निम्निलिखित चीज़ों को अपने आहार में शामिल करना चाहिए:

प्रेग्नेंसी के पहले महीने में क्या खाएं?

  • प्रेग्नेंसी की शुरुआत में गर्भवती महिला को फ़ोलेट से भरपूर खाद्य पदार्थों, जैसे- ब्रोकली व संतरा आदि का सेवन करना चाहिए।
  • गर्भवती को गर्भधारण करते ही विटामिन-बी6 से भरपूर खाद्य पदार्थ, जैसे- केला, साबूत अनाज व सूखे मेवे खाने शुरू कर देना चाहिए।
  • गर्भावस्था की शुरुआत में फ़ाइबर युक्त फलों का सेवन करना चाहिए। इस दौरान गर्भवती को दिन में कम से कम तीन तरह के फल खाने चाहिए।
  • दूध से बने उत्पादों या केवल दूध के सेवन को भी गर्भावस्था के पहले महीने में बहुत फ़ायदेमंद माना जाता है।
  • अगर गर्भवती मांसाहारी हैं, तो उसे मांस का सेवन जारी रखना चाहिए। उसे कम पारे वाले समुद्री भोजन के अलावा ठीक से पका हुआ मांस खाने की सलाह दी जाती है।
  • गर्भवती को प्रेग्नेंसी की शुरुआत में आयरन से भरपूर आहार, जैसे- पालक व चुकंदर को अपने भोजन में शामिल करना चाहिए।
  • गर्भावस्था की शुरुआत होने पर गर्भवती के शरीर को अतिरिक्त कार्बोहाइड्रेट की ज़रूरत पड़ती है। इसके लिए उन्हें शर्करा वाली चीज़ों को अपने खान-पान में शामिल करना चाहिए।

प्रेग्नेंसी के पहले महीने में क्या ना खाएं?

प्रेग्नेंसी की शुरुआत में कुछ चीज़ों को खाने से गर्भवती महिला और उसके भ्रूण को नुकसान हो सकता है। नीचे हम कुछ ऐसी चीज़ों के नाम बताने जा रहे हैं, जिनसे गर्भवती महिला को परहेज करना चाहिए:
  • समुद्री भोजन: गर्भवती को केवल कम पारे वाला समुद्री भोजन ही करना चाहिए। भोजन में पारे का स्तर ज़्यादा होने पर भ्रूण को नुकसान हो सकता है।
  • सॉफ़्ट चीज़: गर्भवती महिला को गर्भधारण करने के बाद, पाश्चराइज्ड दूध से बने चीज़ को खाने से परहेज करना चाहिए। ऐसे चीज़ में हानिकारक बैक्टीरिया होने से भोजन विषाक्तता होने का खतरा रहता है।
  • पैकेट वाली चीज़ें: गर्भवती को प्रेग्नेंसी की शुरुआत में डिब्बाबंद चीज़ों का सेवन नहीं करना चाहिए। साथ ही, माइक्रोवेव में बनाई गई चीज़ें, जैसे- केक, बिस्कुट आदि से भी परहेज करना चाहिए।
  • कच्चा मांस और कच्चे अंडे: कच्चे मांस और कच्चे अंडे में सालमोनेला और लिस्टेरिया नाम के बैक्टीरिया पाए जाते हैं। ये बैक्टीरिया भ्रूण पर बुरा असर डाल सकते हैं। इसलिए, गर्भवती महिला को कच्चे मांस या अंडे का सेवन नहीं करना चाहिए।
  • कच्चा पपीता और अनानास: गर्भावस्था के शुरुआती दिनों में कच्चा पपीता और अनानास खाने से बचना चाहिए। प्रसव के बाद इन फलों को खाया जा सकता है।
  • जंक फ़ूड और शराब: गर्भावस्था के दौरान जंक फ़ूड, शराब व तंबाकू का सेवन नहीं करना चाहिए। इसके अलावा गर्भवती को कैफ़ीन वाली चीज़ें, जैसे- चाय, कॉफ़ी व चॉकलेट का सेवन कम कर देना चाहिए।
नोट: अपनी सुविधा के लिए गर्भवती को डॉक्टर से सलाह लेकर एक डाइट चार्ट बनाना चाहिए।

प्रेग्नेंसी के पहले महीने के लिए व्यायाम

गर्भावस्था के पहले महीने में व्यायाम करना काफ़ी फ़ायदेमंद होता है। इससे गर्भवती के शरीर में चुस्ती-फुर्ती आती है और उसे गर्भावस्था के शुरुआती दौर में होने वाले तनाव से राहत मिलती है। गर्भावस्था के पहले महीने में नीचे बताए गए व्यायाम किए जा सकते हैं:
  • चहल-कदमी (एरोबिक)
एरोबिक एक्सरसाइज़ करने से हृदय स्वस्थ रहता है और नॉर्मल डिलीवरी की संभावना बढ़ जाती है।
  • तैराकी
पानी में इंसान को अपना वज़न ज़मीन के मुकाबले दस गुना कम महसूस होता है। इसलिए, गर्भवती महिलाओं के लिए तैराकी को सबसे आसान और असरदार व्यायाम माना जाता है। गर्भावस्था की शुरुआत में गर्भवती महिलाओं को दिन में 15-20 मिनट तक तैराकी करने की सलाह दी जाती है।
  • पिलेट्स एक्सरसाइज़
इस एक्सरसाइज़ से पेट, पीठ और श्रोणि को मजबूती मिलती है। गर्भवती महिलाएं चाहें तो इस एक्सरसाइज़ को सीखने के लिए पिलेट्स कक्षाओं में जा सकती हैं।
  • स्टेशनरी बाइक या स्पिन कक्षाएं
गर्भावस्था के पहले महीने में स्टेशनरी बाइक चलाना अच्छा हो सकता है। इसके अलावा, उन्हें सप्ताह में तीन बार 30 मिनट के लिए स्पिन कक्षाओं में शामिल होने की सलाह दी जाती है।
  • योगासन
गर्भवती को प्रेग्नेंसी की शुरुआत से ही अपने योग गुरु और डॉक्टर से सलाह लेकर योग के कुछ खास आसनों का अभ्यास करना चाहिए।
नोट: ध्यान रखें कि हर गर्भवती महिला की शारीरिक स्थिति अलग-अलग होती है। इसलिए, कोई भी व्यायाम शुरू करने से पहले डॉक्टर से सलाह लेना ना भूलें।

प्रेग्नेंसी के पहले महीने में किन बातों का ख्याल रखना चाहिए?

गर्भावस्था के पहले महीने में गर्भवती महिलाओं को नीचे दी गई बातों का विशेष तौर पर ख्याल रखना चाहिए:

प्रेग्नेंसी के पहले महीने में क्या करें?

  1. रोज़ाना थोड़ा व्यायाम करें।
  1. फ़ाइबर युक्त भोजन खाएं। इससे गर्भवती महिला को कब्ज़ और अपच की समस्या नहीं होती है।
  1. दिन में कम से कम आठ से दस ग्लास पानी पिएं।
  1. हमेशा सकारात्मक सोचें और खुश रहने की कोशिश करें।
  1. डॉक्टर की सलाह लेकर ज़रूरी विटामिन और अनुपूरक का सेवन शुरू करें।
  1. अपनी खान-पान की आदतों में ज़रूरी सुधार करें और डॉक्टर की सलाह लेकर अपना डाइट चार्ट बनाएं।
  1. हो सके तो एक ऐसा स्वास्थ्य बीमा कराएं, जिससे गर्भावस्था के दौरान ज़रूरी जांच, इलाज और सुरक्षित प्रसव की सुविधा मिले।
  1. लगातार ऐसे लोगों के संपर्क में रहें, जिन्हें गर्भावस्था से जुड़ी जानकारी और अनुभव हो।
  1. ज़्यादा से ज़्यादा सोएं और आराम करें।
  1. अपनी नियमित जांच के लिए सही डॉक्टर का चुनाव करें। इसके लिए आप उन महिलाओं से मदद ले सकती हैं, जिनकी डिलीवरी पहले हो चुकी हो।
  1. प्रेग्नेंसी की शुरुआत होते ही डिलीवरी के लिए वित्तीय योजनाएं बनाना शुरू कर दें।

प्रेग्नेंसी के पहले महीने में क्या ना करें?

  1. लंबी यात्रा करने से बचें। गर्भावस्था के पहले महीने में गर्भपात का खतरा ज़्यादा होता है, इसलिए इस दौरान लंबी यात्रा करने से बचना चाहिए।
  1. ऊंची एड़ी वाली सैंडल ना पहनें। गर्भावस्था के दौरान ऐसे सैंडल पहनने से पैरों में दर्द हो सकता है। इससे पैर मुड़ने और गिरने का खतरा बढ़ जाता है।
  1. ज़्यादा झुकने से बचें और भारी चीज़ें ना उठाएं। ऐसा करने से आपके पेट पर दबाव पड़ सकता है, जिससे शिशु के विकास में बाधा आ सकती है।
  1. गर्भावस्था के दौरान डॉक्टर की सलाह लिए बिना कोई भी दवा नहीं खानी चाहिए।
  1. तनाव से बिल्कुल दूर रहें। इससे बचने के लिए अच्छी किताबें पढ़ें या बढ़िया संगीत सुनें।
  1. डाइटिंग बिल्कुल ना करें। गर्भावस्था के पहले महीने में गर्भवती महिला के शरीर को ज़्यादा पोषक तत्वों की ज़रूरत होती है। ऐसे में डाइटिंग करने से भ्रूण को नुकसान हो सकता है।
  1. हॉट टब बाथ या सॉना बाथ ना लें। सोना बाथ के दौरान तापमान 70 डिग्री सेल्सियस से 100 डिग्री सेल्सियस के बीच होता है। (8) यह तापमान गर्भावस्था के लिए सही नहीं माना जाता।

होने वाले बच्चे के पिता के लिए टिप्स

किसी महिला के गर्भ धारण करने पर, होने वाले बच्चे के पिता की ज़िम्मेदारी बढ़ जाती है। चूंकि, संतान प्राप्ति के सुख में मां और बाप दोनों बराबर के भागीदार होते हैं, इसलिए, प्रेग्नेंसी के दौरान भी दोनों की ज़िम्मेदारी बराबर होती है। नीचे हम कुछ ऐसे टिप्स दे रहे हैं, जिनकी सहायता से होने वाले बच्चे के पिता अपने हिस्से की ज़िम्मेदारी को बेहतर तरीके से निभा सकते हैं:
  • सभी कागज़ी काम खुद करें: बच्चे की मां के लिए कौन-सा स्वास्थ्य बीमा लेना है और उसमें कितना खर्चा होगा, ऐसी तमाम चीज़ों का ख्याल बच्चे के पिता को खुद रखना चाहिए।
  • प्रेग्नेंसी के बारे में पढ़ें: बच्चे के पिता को प्रेग्नेंसी के बारे में ज़्यादा से ज़्यादा जानने की कोशिश करनी चाहिए। इससे उन्हें बच्चे की मां की भावनाओं और ज़रूरतों को समझने में मदद मिलती है।
  • संयम बरतें: प्रेग्नेंसी के पहले महीने में हार्मोनल बदलावों के चलते गर्भवती महिला के स्वभाव में लगातार उतार-चढ़ाव होता रहता है। इसके अलावा वह बार-बार खाने की इच्छा भी प्रकट कर सकती है। ऐसे में बच्चे के पिता को संयम से काम लेना चाहिए और गर्भवती महिला की हर छोटी-बड़ी ज़रूरतों को पूरा करने की कोशिश करनी चाहिए।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

1. क्या गर्भावस्था के पहले महीने के दौरान संभोग करना सुरक्षित है?

हां, अगर आपको पहले कभी गर्भपात या प्रीमैच्योर डिलीवरी जैसी समस्या नहीं हुई है, तो आप इस दौरान समभोगकर सकते हैं। फिर भी एक बार इस बारे में अपने डॉक्टर से सलाह ज़रूर लें।

2. प्रेग्नेंसी की शुरुआत में रक्तस्राव का क्या मतलब हो सकता है?

प्रेग्नेंसी के पहले महीने में गर्भ में भ्रूण के प्रत्यारोपण के कारण रक्तस्राव हो सकता है। इसलिए ऐसा होने पर घबराना नहीं चाहिए। फिर भी रक्तस्राव होने पर अपने डॉक्टर को इसकी जानकारी देनी चाहिए। 

3. क्या गर्भावस्था के पहले महीने में पेट के निचले हिस्से में दर्द होता है?

हां, गर्भावस्था के पहले महीने में पेट के निचले हिस्से में दर्द हो सकता है। यह दर्द गर्भ में भ्रूण के प्रत्यारोपित होने की वजह से होता है। आमतौर पर एक से दो दिन में यह दर्द चला जाता है।

हम उम्मीद करते हैं कि इस लेख में आपको गर्भावस्था के पहले महीने से जुड़ी सारी जानकारियां मिल गई होंगी। अगर अब भी आपके मन में कोई सवाल है, तो नीचे कमेंट बॉक्स में उसे ज़रूर लिखें।

संदर्भ (References):

 by Medline plus

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